मां बनाम दर्द
माँ बनना हर औरत का सपना होता है। लेकिन उसमे भी कई शर्ते आगे आ जाती है। अनुभव तो शायद वही होता है, बस एक परंपरा की डरकर होती है। पिछले दिनों ऐसे ही दर्द को काफी नजदीक से देखने का मौका मिला। एक ओर माँ बन्ने की ख़ुशी को एक औरत फ़ोन से किसी के साथ शेयर कर रही थी तो दूसरी ओर माँ बनने की खबर ने उसके होश उड़ा दिए थे। चहरे की शिकन साफ बता रही थी की वह परेशां है। हाथो में कपडे का थैला बार बार मोबाईल पर बात करना और पसीने को पोछना। पूरी तरह परे शान थी। बहुत कन्विंस कर के पूछने के बाद पता चला की वह कुंवारी माँ बनने वाली है। मैंने जब उससे पूछा की इस बच्चे का बाप कहा है तो उसकी आखें भर आई थी उसने बताया की वह अब उसे छोड़ गया है। हालाकि यह वाकया आम बात हो गयी है। लेकिन मन में एक सवाल बार बार आ रहा है। क्या परम्पराए aआदमी से बड़ी है जिसे ही हमने ही बनाया है?


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