Thursday, July 15, 2010

नूरजहाँ का दर्द



पिछले दिनों रिपोर्टिंग के दौरान ही एक ऐसी बुजुर्ग महिला से मिलने का मौका मिला कि कलेजा मुंह को आ गया। एक टूटी झोपड़ी, फर्श के नाम पर कीचड़ भरी जमीं, जहाँ जानवर को भी रहना नागवार गुजरे। हजारो मक्खियाँ भी जैसे उन्हें तंग करने पर आमादा थी। गंदे कपड़ो के बीच वह रहने को लाचार। राह चलते लोग उसे पागल कह रहे थे। मैंने झोपड़ी में जाकर जब पूछा तो पता चला की उसके बेटों ने उसे इस हालत में रहने पर मजबूर किया है। बातो ही बातों में पता चला की उसका नाम नूरजहाँ है। बेटे ने इलाज के नाम पर यहाँ लाया और छोड़ कर चला गया। उसने बताया की गाँव में जब भी वह मुझसे झगड़ता थी बोलता था की तुम्हे घर से बाहर उठा कर फेंक देंगे, लेकिन सच में ऐसा ही करेगा पता नहीं था, उसकी आँखों में आंसू थे। लेकिन आसपास वालों ने उसे सहारा दिया। हर दिन एक घर से खाना आ जाता है। कोई न कोई महिला कपडे भी आकर भी कभी कभी बदल देती है। फिर भी जिस हाल में वह रह रही है, शायद जानवर भी न रहे। क्यूंकि अब आखिरी पड़ाव है और अपनों ने भी साथ छोड़ दिया। सवाल यह है कि हाशिये पर रहने वालो इन बुजुर्गों की ऐसी हालत का जिम्मेदार कौन है, जवाब हमें ही तलाशना है।

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