Friday, December 1, 2017



मत जा प्रश्नों के दायरे से बाहर 

सोच मत वहां से आगे जहां हम न सोचते हो
मत बोल ऐसे  बोल जिसे मेरे कान मेरे ना चाहते हो
हम धड़ के ऊपर की विरासत रखते हैं
तुम्हारी पहचान धड़ के नीचे की है
जीवन तुम्हारा कुछ नहीं मैं हूं तेरा सारथी
मत जा प्रश्नों के दायरे से बाहर ऐ गार्गी
 जब भी दायरा तोड़ा है तुमने
हमने तुम्हारा ग्रास किया
क्या अब भी कुछ बोलने को है
जब हमने तुम्हारा परिहास किया
हर युग में है याज्ञवल्क
छिनेगा फिर से तुम्हारा तर्क एक बारगी
मत जा प्रश्नों के दायरे से बाहर ऐ गार्गी
 तुम हमारी सिर्फ सहचरी बनो
समर्पण की मूर्ति व आज्ञाकारी बनो
'हम' पर ही टिके रहो
'मैं' का सवाल मत बनो
मत ललकारो हमारी सत्ता को
कहानी एक और रच जायेगी संहार की
मत जा प्रश्नों के दायरे से बाहर ऐ गार्गी
(विजया)
 ...........................................................................

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home