Thursday, July 15, 2010

नूरजहाँ का दर्द



पिछले दिनों रिपोर्टिंग के दौरान ही एक ऐसी बुजुर्ग महिला से मिलने का मौका मिला कि कलेजा मुंह को आ गया। एक टूटी झोपड़ी, फर्श के नाम पर कीचड़ भरी जमीं, जहाँ जानवर को भी रहना नागवार गुजरे। हजारो मक्खियाँ भी जैसे उन्हें तंग करने पर आमादा थी। गंदे कपड़ो के बीच वह रहने को लाचार। राह चलते लोग उसे पागल कह रहे थे। मैंने झोपड़ी में जाकर जब पूछा तो पता चला की उसके बेटों ने उसे इस हालत में रहने पर मजबूर किया है। बातो ही बातों में पता चला की उसका नाम नूरजहाँ है। बेटे ने इलाज के नाम पर यहाँ लाया और छोड़ कर चला गया। उसने बताया की गाँव में जब भी वह मुझसे झगड़ता थी बोलता था की तुम्हे घर से बाहर उठा कर फेंक देंगे, लेकिन सच में ऐसा ही करेगा पता नहीं था, उसकी आँखों में आंसू थे। लेकिन आसपास वालों ने उसे सहारा दिया। हर दिन एक घर से खाना आ जाता है। कोई न कोई महिला कपडे भी आकर भी कभी कभी बदल देती है। फिर भी जिस हाल में वह रह रही है, शायद जानवर भी न रहे। क्यूंकि अब आखिरी पड़ाव है और अपनों ने भी साथ छोड़ दिया। सवाल यह है कि हाशिये पर रहने वालो इन बुजुर्गों की ऐसी हालत का जिम्मेदार कौन है, जवाब हमें ही तलाशना है।

Monday, July 12, 2010

महंगे गाने गरीब गीतकार


आमिर खान की आनेवाली फिल्म पिपली लाइव इन दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में है। खासकर उसका यह गाना सखी सैयां तो खूब कमात है वाले गाने ने तो धूम मचा दिया है। लगभग छः करोड़ की लगत से बनने वाली यह मूवी संभव है की हिट भी कर जाएगी। क्यूंकि यह इतिहास रहा है की जब भी फिल्मो में फोक गानों को परदे पर उतरा गया है हिट ही रहा है। यह गाना उसी हिट की एक कड़ी है लेकिन परदे पर देखने में अच्छा लगने वाला और कानो में मिठास घोलने वाले इस गीत की सच्चाई कुछ और है। परदे पर जिन कलाकारों ने गाने को निभाया है उन कलाकारों को मात्र १०० रुपये के हिसाब से पे किया गया है। महंगाई पर पहले ही पोलिटिक्स क्या कम थी जो अब परदे पर भी होने लगी। वैसे भी यह गाना तो आमिर ने मुफ्त में प् लिया और स्क्रीन पर की कलाकारों को महंगाई के गाने गवा कर वापस महंगाई की ओर धकेल दिया। क्या दिन भर की कमी सिर्फ १०० रुपये ही है। क्या जिस गाने से मूवी हाईलाइट हुई। उसकी कीमत महज ११०० रुपये ही। अब आप ही बताये खून अकले महंगाई चूस रही है या सो कॉल बड़े लोग.

Sunday, July 11, 2010

मां बनाम दर्द

माँ बनना हर औरत का सपना होता है। लेकिन उसमे भी कई शर्ते आगे आ जाती है। अनुभव तो शायद वही होता है, बस एक परंपरा की डरकर होती है। पिछले दिनों ऐसे ही दर्द को काफी नजदीक से देखने का मौका मिला। एक ओर माँ बन्ने की ख़ुशी को एक औरत फ़ोन से किसी के साथ शेयर कर रही थी तो दूसरी ओर माँ बनने की खबर ने उसके होश उड़ा दिए थे। चहरे की शिकन साफ बता रही थी की वह परेशां है। हाथो में कपडे का थैला बार बार मोबाईल पर बात करना और पसीने को पोछना। पूरी तरह परे शान थी। बहुत कन्विंस कर के पूछने के बाद पता चला की वह कुंवारी माँ बनने वाली है। मैंने जब उससे पूछा की इस बच्चे का बाप कहा है तो उसकी आखें भर आई थी उसने बताया की वह अब उसे छोड़ गया है। हालाकि यह वाकया आम बात हो गयी है। लेकिन मन में एक सवाल बार बार आ रहा है। क्या परम्पराए aआदमी से बड़ी है जिसे ही हमने ही बनाया है?

Saturday, July 10, 2010

आज बंद है

धंधा पानी चंद है
आना जाना बंद है
पेट की आग मंद है
क्यूंकि आज बंद है

शाम का चूल्हा नहीं जलेगा
मुन्ना दूध को नहीं मचलेगा
हाथ बहुत तंग है
क्यूंकि आग बंद है

आज नहीं होना है बीमार
नहीं बनना है लाचार
अस्पताल भी नहीं संग है
क्यूंकि आज बंद है

महंगाई के खिलाफ उठी है आवाज़
उसी का है यह आगाज़
कमजोर हो या जाबाज़
सबका हाल तंग है
क्यूंकि आज बंद है