Sunday, September 16, 2018

स्त्री खिलौना या खिलौना स्त्री




कितना अच्छा हो वो न अपना हक मांगे, न अपनी पहचान बनाने की कोशिश करे, न अपना स्पेस, न अपनी खुशी न अपना जीवन। कोई भी मांग होठों पे न आए। आए तो बस अपने साथी के लिए प्यार और न मिटने वाली कभी मुस्कान। भले ही वह मुस्कान उसकी अपनी खुशी के एवज में न हो। वह अपने साथी के मूड के हिसाब से हँसेगी और रोएगी भी। जीवन के साथ उसकी सांस भी साथी की गुलाम होगी। यहीं नहीं देखने मे गोरी, सुंदर, भरी-पूरी और पूरी तरह से आज्ञाकारी। पितृसत्तात्मक समाज में ऐसी ही औरतें सरहनीय हैं और एडयोंरेबल हैं। पुरुषों की पसंद से ही उनके रूप को सर्टिफिकेट दिया जाता है। इंसान के दायरे में  शायद ही उन्हें लेकर सोचा जाता है उनको। जी हाँ, बात स्त्री की हो रही है। उस स्त्री की जिसके बारे में सिनेमा ने भी चीख- चीख कर कहा है कि 'स्त्री देह की नहीं बल्कि प्रेम, सम्मान और इज्जत की भूखी है'| यहाँ सिर्फ सिनेमा की बात नहीं, स्त्री मन को उभारने की कोशिश है। अब जब समाज स्त्री को एक कमोडिटी के रूप मे देख रहा है तब भला बाज़ार उस सोच को भुनाने में पीछे क्यों रहे? अब तक तो शारीरिक सुख देने वाले खिलौने ही मार्केट मे थे, अब पूरी- की- पूरी औरत ही मार्केट मे तैयार है। कम पैसे वाले सेक्स एजेंट बनी औरतों से हॉट बातें बोल-सुन  कर काम चला रहे हैं या थे भी, उच्च वर्ग साक्षात अपने मनोरंजन को  अपने हाथों मे रखेगा, यानि फूल कमांड
चीनी कंपनी डब्‍ल्यूएमडॉल सेक्स डॉल बनाती है, मार्केट में अपने प्रॉडक्ट को लॉंच किया है।.कंपनी के डायरेक्‍टर दांग्यू यांग ने खुद अपने साक्षात्कार मे स्वीकारा है कि, “ये सेक्‍स डॉल पत्‍नी और गर्लफ्रेंड की जगह ले सकती है। पुरुषवादी सोच वाले तथाकथित मर्द हाड़- मांस की जीती- जागती औरतों से अपने अनुरूप इशारे पर नाचने वाली गुड़िया बनाना चाहते हैं, उनके लिए सामग्री कंपनी ने माल तैयार कर दिया है। बस बैटरी चार्ज करना है और एक बटन पर सब कुछ उनके अनुरूप। सिर्फ और सिर्फ प्यार देने को तत्पर। क्योंकि उसके पास अपनी भावनाएं तो होंगी ही नहीं। वैसे भी स्त्री की भावनाओं का करना भी क्या है? इस चीनी गुड़िया की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार मे 2 लाख रुपये है। इस गुड़िया की खासियत है कि वह न सवाल करेगी और न बराबरी का हक़ मांगेगी। इसके अलावा वह सब करेगी, जो मर्द उसके साथ करना और करवाना चाहेंगे। ये चीनी गुड़िया दिखने में असली औरत जैसी लगती है. उसका चेहरा, बाल, नाखून, हाथ, पैर और चिकनी त्‍वचा है। वो स्त्रीवादी भी नहीं है, न उसके नखरे उठाने हैं, न ही ताने सुनने हैं। इसलिए अब पुरुषवादी सोच वाले समाज को न तो बेकाबू औरतों पर खाप पंचायत बिठाने की जरूरत होगी न फतबा जारी करने की ड्यूटी और न ही बलात्कार तेजाब फेंकने जैसे (कु) कर्म करने पड़ेंगे। अभी कुछ दिन पहले की घटना हरियाणा की है, जिसमें सीबीएसीई टॉपर के साथ गैंगरेप की घटना घटी। कई कारणों के साथ उसका टॉपर होना भी शामिल है। जो उन लड़कों को रास न आया। सोचनीय है, समाज किस ओर जा रहा है। सेक्स का बाज़ार जिसे सिर्फ देह का बाज़ार कहा जाए तो आंकड़े चौकाने वाले हैं।
हैवोकस्कोप रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक देह व्यापार में भारत को भी बड़ा बाजार बताया गया है।. इंडोनेशिया में देह का कारोबार 2.25 अरब डॉलर का है, यूनिसेफ के मुताबिक इंडोनेशिया में देह व्यापार से जुड़ी 30 फीसदी युवतियां नाबालिग हैं। स्विटजरलैंड 3.5 अरब डॉलर का है। तुर्की में देह व्यापार कानूनी होने के बावजूद 4 अरब डॉलर का है। फिलीपींस 6 अरब डॉलर का कारोबार है। थाईलैंड 6.4 अरब डॉलर का कारोबार करता है। यह देश भी सेक्स टूरिज्म के लिए मशहूर है। थाइलैंड में देह व्यापार कानूनी है। यहां खास जगहों पर ही देह व्यापार की अनुमति है। स्थानीय अधिकारी यौनकर्मियों की रक्षा भी करते हैं। कहा जाता है कि वियतनाम युद्ध के बाद से ही थाइलैंड सेक्स टूरिज्म के लिए मशहूर हुआ। भारत में सेक्स कारोबार 8.4 अरब डॉलर का है। दक्षिण कोरिया 12 अरब डॉलर और अमेरिका 14.6 अरब डॉलर का सेक्स कारोबार है। अमेरिका में आमतौर पर देह व्यापार कानूनी है। हालांकि नेवाडा राज्य के कुछ इलाकों में यह गैरकानूनी है। अमेरिका में देह व्यापार के लिए आधिकारिक तौर पर आवेदन किया जा सकता है। जर्मनी 18 अरब डॉलर है। अनुमान के मुताबिक जर्मनी में 40,000 सेक्स वर्कर हैं। यह कानूनी है लेकिन सामाजिक दशा और अधिकारों से जुड़े कई नियम हैं। जापान 24 अरब डॉलर का है। स्पेन 26.5 अरब डॉलर का है। और अंत में  चीन में 73 अरब डॉलर के साथ दुनिया का सबसे बड़ा यौन कारोबार इस देश में होता है। यहां देह व्यापार गैरकानूनी है।
ये आंकड़े तो प्रत्यक्ष रूप से स्त्री को सिर्फ देह के रूप में भोगने और परोक्ष रूप से सेक्स की जरूरतों को बताते हैं, जिसे बाज़ार मुहैया कराता है। मगर उस मानसिकता का क्या जो जीते- जागते इंसान को खिलौना समझता हो और फिर खिलौने को इंसान के रूप मे देखने की कोशिश करे? गंभीर और सोचनीय विषय है। चिंतन की आवश्यकता है!!

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