सोशल मीडिया की भाषा में पाराडाइम शिफ्ट
सोशल
मीडिया ‘लोगों के द्वारा लोगों के लिए’ के कांसेप्ट को लेकर उपस्थित हुआ है। चूँकि
इस मीडिया के केंद्र में आम लोग या जनता थी, इसलिए इसकी भाषा भी आम लोगों की भाषा
को साथ लेकर चली। इससे हिंदी भाषा को बहुत
बल मिला। भारत जैसे देश में जहाँ मुट्ठी भर लोगों का अंग्रेजी पर वर्चस्व है, वहाँ
संख्या बहुल की दृष्टि से हिंदी भाषा को अपना परचम लहराने का मौका मिला। और इस तरह
सोशल मीडिया की भाषा में हिंदी की बढ़त लगातार जारी रही। पिछले कुछ वर्ष पहले
तक विश्व में 80 करोड़ लोग हिंदी समझते, 50 करोड़ बोलते और 35 करोड़ लिखते थे, लेकिन सोशल
मीडिया पर हिंदी के बढ़ते
इस्तेमाल के चलते, अब अंग्रेजी
उपयोगकर्ताओं में भी हिंदी का आकर्षण बढ़ा है और इन आंकड़ों में भी तेजी से
वृद्धि हुई है। वर्तमान में भारत,
दुनिया का तीसरा
सबसे बड़ा इंटरनेट
उपयोगकर्ता है, जिसका श्रेय हिंदी भाषा को भी जाता है। सोशल मीडिया पर हिंदी भाषा
के विस्तार की गति का अंदाजा
इसी से लगाया जा सकता है कि अप्रैल 2015 तक देश में सोशल मीडिया का
इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 14.3 करोड़ रही, जिसमें ग्रामीण
क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की संख्या पिछले एक साल में 100 प्रतिशत तक बढ़कर ढाई करोड़ पहुंच गई जबकि शहरी इलाकों में यह
संख्या 35 प्रतिशत बढ़कर 11.8 करोड़ रही। सबसे
खास बात यह है, कि न केवल नई
पीढ़ी बल्कि अंग्रेजीदा लोग भी सोशल मीडिया पर हिंदी में लिख रहे हैं। लेकिन इन सब बातों में एक सवाल छिपा है, वह यह कि क्या यह
वही हिंदी है, जिसमें हम लिखते- पढ़ते आए हैं? तो इसका जवाब है नहीं। क्योंकि सोशल
मीडिया पर लिखी जाने वाली हिंदी अलग है।
कह सकते हैं कि हिंदी ने एक नया आवरण ओढ़ लिया है। और हिंदी ही क्यों
अंग्रेजी पर तो इसका प्रभाव कुछ ज्यादा ही है।
इस आवरण ने भाषा का ऐसा भेष बदला है कि अगर
कहा जाए कि भाषा में पाराडाइम शिफ्ट आ गया है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। सवाल
यह है कि आखिर पाराडाइम शिफ्ट है क्या?
पाराडाइम
शिफ्ट के मायने हैं ‘क्रांतिकारी बदलाव’। भाषा में आए इस क्रांतिकारी बदलाव यानी
पाराडाइम शिफ्ट को कनाडा के
ओ.आई.एस.ई. (O.I.S.E.)
टोरोंटो
विश्वविद्यालय में शिक्षा में समाजशास्त्र के प्रोफेसर, एम.एल.
हांडा ने सामाजिक विज्ञानों के परिप्रेक्ष्य में रूपावली के एक सिद्धांत को विकसित
किया है। उन्होंने “शिफ्टिंग” के अर्थ को उनके अनुसार
परिभाषित किया है और “सोशल शिफ्टिंग” का दृष्टिकोण प्रस्तुत
किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने इसके मूल अंश की पहचान की है। ये “पाराडाइम
शिफ्टिंग” के
नाम से जानी जाने वाली एक लोकप्रिय प्रक्रिया है। इस संदर्भ में वे ऐसी सामाजिक
परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिनसे ऐसा बदलाव होता है। दरअसल पाराडाइम
शिफ्ट की अवधारणा सबसे पहले थामस कुह्न ने अपनी पुस्तक, द
स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रिवोलुशनस में वैज्ञानिक क्रांति का
नाम दिया। कुह्न के अनुसार, वैज्ञानिक क्रांति तब होती है जब वैज्ञानिकों
का सामना ऐसी असामान्यताओं से होता है, जो सार्वभौमिक रूप से
स्वीकृत उस रूपांतरण के आधार पर समझाई नहीं जा सकती हैं, जिसकी
सीमा में रह कर अब तक की वैज्ञानिक तरक्की की गई हो। यह रूपांतरण, कुह्न
के विचार में केवल वर्तमान सिद्धांत नहीं है बल्कि एक संपूर्ण वैश्विक नजरिया है, जिसमें
वह व उसमें निहित प्रभाव मौजूद होते हैं। यह वैज्ञानिकों द्वारा अपने चारों ओर
पहचानी गई ज्ञान की दृश्यावली की विशेषताओं पर आधारित है। जिस सोशल शिफ्टिंग की
बात कुह्न ने की है उसकी मुख्य भूमिका में संचार के कारक ही हैं। तो क्यों न यह
पड़ताल की जाए कि संचार के क्षेत्र में पाराडाइम शिफ्ट के कारक या कारक कौन से हैं?
जब हम इब बातों की तह तक जायेंगे तब सोशल मीडिया को पाते हैं। यानी सोशल शिफ्टिंग,
संचार, सोशल मीडिया और उसके बाद उसकी भाषा। यह क्रम सही बैठता है।
अब
पाराडाइम शिफ्ट को कुछ उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। जैसे- अंधकार युग से
पुनर्जागरण की ओर, द्वितीय विश्वयुद्ध की दुनिया, सोवियत संघ का विघटन आदि। संचार
की दृष्टि से देखें तो 21वीं सदी के इस दौर में हमलोग संचार के एक बुनियादी बदलाव
से गुजर रहे हैं। इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया जैसे- फेसबुक, ट्विटर ने लोगों के
बीच एक नये तरीके का संचार शुरू किया है। सोशल मीडिया की भाषा को इस संदर्भ के तहत
बेहतर समझा जा सकता है। समाज में हमारी भूमिका भिन्न स्थितियों में अलग- अलग होती
है। किसी विशिष्ट समूह या सामाजिक स्थिति में हम व्यवहार करते हैं या विशेष भूमिका
का निर्वहन करते हैं। इन भिन्न भूमिकाओं में एक चीज जो निरंतर चलती है, वह है
भाषा। इसी से हम अपने समाज को देखते और समझते हैं। हम समाज में अलग- अलग
परिस्थिति, स्थान, समय में अलग- अलग भाषा का प्रयोग करते हैं। आज संचार- तकनीक की
भाषा को हमें उसी तकनीकी उपकरण के संदर्भ में समझना होगा। हमें यह समझना होगा कि
हमें ऐसी भाषा का इस्तेमाल इसी उपकरण के संदर्भ में करते हैं न कि समाज के व्यापक
परिवेश या संदर्भ में। हालांकि सोशल मीडिया की भाषा ने समाज की भाषा में बदलाव का
काम शुरू तो कर ही दिया है। सारा मामला ‘गिव एंड टेक’ का है। सोशल मीडिया पर भी जो
भाषा लिखी जा रही है उसे समाज का एक तबका (नेटिजन) ही लिख रहा है, और फिर उसी भाषा
का विस्तार समाज में हो रहा है। और इस लेनदेन की प्रक्रिया का परिणाम यह है कि
भाषा में क्रांतिकारी बदलाव की दस्तक शुरू हो चुकी है। दस्तक इसलिए क्योंकि यह
बदलाव की शुरुआत है, यह लगातार हर दिन जारी है। समाजशास्त्री इरवीन गॉफमैन ने अपनी
‘फेस थ्योरी’ में बताया कि जब हम समाज में दूसरों से बातचीत करते हैं तो इस बात का
ध्यान रखते हैं कि जिस भाषा का हम
इस्तेमाल करेंगे लोग हमें उसी रूप में लेंगे और हमारी वैसी ही पहचान बनेगी। लेकिन
सोशल मीडिया में भाषा बहुत हद तक तकनीकी पक्ष द्वारा भी निर्देशित होती है साथ ही कहीं-न-
कहीं ‘फेस थ्योरी’ भी काम कर रही होती है। भारतीय भाषा ख़ास कर हिंदी के संदर्भ में
हम बात करें तो आज सोशल मीडिया की नीव पर निर्मित ग्लोबल
गाँव जिसकी कोई परिभाषित सीमा नहीं है, हिंदी
भाषा का विस्तार करने में सक्षम है। यही
वजह है कि भाषा में जो पाराडाइम शिफ्ट के कारक हैं
उनमें संक्षिप्तीकरण, जिसमें इन्फोपिक्स, एक्रोनियम जैसे LOL,
ALS (Age, location, sex) आदि का प्रयोग। इमोटिकाउंस( इमोशंस+ आइकन
), अनौपचारिक वर्तनी उच्चारण के अनुरूप ( R u cm) मतलब are
you come आदि. स्वर (vowels) का गायब होना जैसे But के bt, night के लिए n8 लिखना।
इसी के तहत वाक्यों का संक्षिप्तीकरण जैसे OMG (oh my god)
आदि।
पहले ही कहा गया है कि भाषा के बदलाव में तकनीकी
पक्ष और फेस थ्योरी दोनों काम करते हैं. तकनीक और हिंदी के संबंधों पर अगर बात
करें तो 80 के दशक में कंप्यूटर की दुनिया में हिंदी भाषा ने डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम
(डॉस) के जमाने में अक्षर, शब्दरत्न आदि जैसे वर्ड प्रोसैसरों के रूप
में कदम रखा। बाद में विण्डोज़ का
पदार्पण होने पर 8-बिट ऑस्की फॉण्ट जैसे
कृतिदेव, चाणक्य
आदि के द्वारा वर्ड प्रोसैसिंग, डीटीपी तथा ग्राफिक्स अनुप्रयोगों में हिंदी भाषा
में मुद्रण संभव हुआ। लेकिन तब हिंदी भाषा केवल
मुद्रण के काम तक ही सीमित रही। गूगल
ने 2007 में अपने हिंदी भाषा अनुवादक का प्रारंभ किया और इसके बाद यूनिकोड फॉण्ट
का विकास हुआ जिसको माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम में विण्डोज़ 2000 का समर्थन मिला। इस
तरह हिंदी भाषा का टेक्नोलॉजी की दुनिया में विस्तार हुआ।
सोशल
मीडिया पर हिंदी भाषा के विकास ने भारतीयों को सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ओर
आकर्षित किया है। आज फेसबुक,
ट्विटर, ब्लॉग, व्हाटस एप्प
या कोई अन्य नेटवर्किंग साइट सभी पर हिंदी भाषा की सुविधा उपलब्ध है।
हिंदी
भाषा के कंप्यूटरीकरण के बाद सोशल मीडिया प्रयोगकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही
है। आज भारत में 2000 लाख से
अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। गूगल
इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 2018 तक लगभग आधा देश इंटरनेट के माध्यम से जुड़ जाएगा।
अब जब तब देश का इतना बड़ा तबका या भाग सोशल मीडिया से जुड़ा है तब
समाज में चलने वाली भाषा पर इसका असर न पड़े यह संभव नहीं है।
इस
तरह सोशल मीडिया ने भाषा जो पाराडाइम शिफ्ट किया है, उसकी चपेट में मुख्य रूप से
अंग्रेजी व हिंदी दोनों ही हैं, फिलहाल आज के संदर्भ में तो कहा जा सकता है। लेकिन
आने वाले समय में हिंदी (मानक) इस प्रभाव से कितनी अछूती रहेगी, यह कहना मुश्किल
होगा।
विजया सिंह, रिसर्च स्कॉलर, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय
हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा