Sunday, September 16, 2018

डेमोक्रेसी बनाम मॉबो क्रेसी


इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं क्योंकि इसका कोई चेहरा नहीं है. हम भी चाहे तो इसे अनदेखा कर सकते हैं क्योंकि कम से कम इतिहास में हम दोषी होने से बच जाएंगे. करना बस इतना है  कि सब जानते हुए हमें अपनी आँखें बंद कर लेनी है.  हमें दुःख भी नहीं होगा,  यह भी नहीं जान पाएँगे कि वह औरत कौन थी, उसके पीछे दौड़े आ रहे लोग कौन थे?  क्या करना है हमें. वैसे भी ये मॉब लीचिंग की घटनाएँ इतनी आम हो गयी हैं, इससे संबंधित सूचनाएं इतनी अधिक मात्रा में जमा हो गयी हैं कि अब सूचनाएं भी बेअसर होने लगी हैं. अब हमारी भावनाएं आहत नहीं होतीं, हम ‘यूज़ टू’ हो गए हैं. हमें लगता है कि अरे ये तो वही पुरानी बात है. मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर बड़ी- बड़ी बहस चलेगी और फिर सब कुछ ख़त्म... लेकिन ध्यान रहे, खरगोश के द्वारा आँखें बंद कर लेने से बिल्ली जो सामने आ रही है वो तो आयेगी ही, उसका खतरा तो बरकरार रहेगा ही, हाँ खरगोश ये कुछ पल के लिए सोच सकता है कि वह सुरक्षित है. आज हमारा लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील होता जा रहा है, डेमोक्रेसी, मोबोक्रेसी बन चुकी है. समाज भीड़ में तब्दील हो चुका है, जिसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है, न कोई चेहरा है न कोई चरित्र है. कुछ ऐसी ही बेचारित्र वाली भीड़ ने बिहार के भोजपुर जिले के बिहिया क्षेत्र में अपनी घोर पौरुषता का परिचय दिया है. एक महिला को नंगा करके, सरेबाजार दौड़ा- दौड़ा कर उसकी पिटाई करके. आखिर करें भी क्यों नहीं, देश हमारा भीड़तंत्र में जो बदल रहा है. भीड़ ने अपने- आप ये हक ले लिया है कि उसे जो पसंद नहीं वो अपने दंगाई तरीके से उसका विरोध करेगी ही. सचमुच स्थिति बहुत भयावह है, सोचनीय है. मॉब लिंचिंग इस समय का सच है, नई पीढ़ी दंगाइयों के रूप में तैयार हो रही है, भीड़ बन रही है. ये जो नई पौध तैयार हो रही है, यह भीड़ सिर्फ वह भीड़ नहीं, जिसका कोई चेहरा नहीं है, यह रोबोट की तरह तैयार की गई भीड़ है, सांप्रदायिक आदि चीजों की बकायदे प्रोग्रामिंग की गयी है इसके भीतर, बस एक बटन स्विच ऑन की जरूरत है. इस भीड़ का रूप ‘रोबो रिपब्लिक’ का बन चुका है, जहर का ईंधन इन्हें दिया जा रहा है. बिहिया में घटी इस शर्मनाक घटना में देखें और सोचें कि जो भीड़ में ये तथाकथित पुरुष हैं, इसकी उम्र क्या है? बहुत सारे लोग तो बिल्कुल नवयुवक हैं. दरअसल पूरा घटनाक्रम यह है कि विमलेश साहू की लाश रेलवे ट्रैक पर पायी जाती है, वह रेलवे ट्रैक जो उस महिला के मुहल्ले से हो कर गुजरता है. अब चूँकि भीड़ को महिला पर विमलेश की हत्या का शक है, इसलिए उसके साथ इस घटिया और शर्मनाक घटना को अंजाम दिया जाता है. भीड़ में कोई जिम्मेवार नहीं ठहरता, कोई ज़वाबदेही नहीं होती, इसलिए आज मॉब लिंचिंग ऐसे कुत्सित मानसिकता वालों का हथियार बन चुका है. भीड़ के रूप में वे किसी के रोजगार को आग के हवाले कर सकते हैं, किसी के बच्चे का सिर फोड़ सकते हैं, वाहन जला सकते हैं और तो और ये किसी की अस्मत को तार- तार भी कर सकते हैं.  ऐसे ही कुछ दिन बीत जाएंगे, लोग इस घटना पर बहस करना छोड़ देंगे, अंततः इस घटना को भूल जाएंगे. लेकिन विश्वगुरु कहे जाने वाले भारत के पीछे ये नंगी औरत हमेशा जवाब और न्याय के पीछे दौड़ती रहेगी. हालाँकि वो फ़्लैश बैक में चली जाएगी, किसी को दिखेगी भी नहीं शायद, मगर फिर भी दौड़ती रहेगी.
आज दंगाइयों से भरे इस देश में भीड़तंत्र राज कर रहा है. वो भीड़ जो एक पल में किसी भी माँ या बहन को औरत बना देती है. सच्चाई भी है कितना भी समाज दुहाई दे ले, औरतों को रिश्ते में बाद में पहले एक औरत के रूप में देखा जाता है. यही नजरिया पुरुषों को मर्द जो बनाती है, शायद. हमारे विश्वगुरु भारत ने इन्हें बहुत सारे, भर- भर के अधिकार भी दिए हैं. पति को गुस्सा आता है तो उसे पत्नी को हत्या करने का हक है, प्रेमी के प्रेम को न मानने वाली उस लड़की को मार सकने की हक़ है. भारत में मर्दों को कितनी छूट है वो भीड़ बन कर किसी औरत को सरेबाजार नंगा कर सकते हैं, पति बन कर पत्नी पर शासन कर सकते हैं और न मानने पर मौत का इतिहास भी लिख सकते हैं, किसी से प्रेम करें और उसकी बात वह न माने तो उसके जीवन का अंत कर सकते हैं, जो लड़की उन्हें पसंद आए उसके साथ वो खुलेआम छेड़खानी कर सकते हैं, वो तय कर सकते हैं कि औरतें क्या पहने कि वे (पुरुष) नियंत्रण में रहें नहीं तो मन बहकेगा तब वे छेड़खानी करेंगे ही...  आज हमारे दौर का सबसे कटु सत्य है कि लोग लोकतंत्र में आस्था न रख कर भीड़तंत्र में आस्था रखने लगेहैं , जो सच में सोचनीय है.
अब बात करते हैं तस्वीर के दूसरे पक्ष की, यानी औरतों की. भारत में औरतों के दिमाग में बहुत जबरदस्त तरीके से बिठाया गया है कि वो देवी हैं और वे तो पूजनीय हैं, वो ये मानेंगी ( और नहीं तो मनवाया जाएगा) कि ऐसी घटनाएँ तो कभी- कभी होती ही रहेंगी, क्योंकि उस औरत ने करनी ही ऐसी की है. हम तो सभ्य महिलाएं हैं हम भला आवाज कैसे उठाएंगी, हम तो एक आदर्श भारतीय नारी हैं,  पचड़े में कौन पड़े. अपने तथाकथित ‘सेफ जोन’ से बाहर कौन निकले? यहीं नहीं जरूरत होगी तो हम कुकर्मी पति को बचाएंगे, भाई चाहे किसी  की बहन की इज्जत पर हाथ डाले, हम उसकी इज्जत ढक देंगे,  पिता चाहे लाख एय्यासी करे, एक जिम्मेदार बेटी की तरह हम समाज के सामने चीख- चीख कर उसके बचाव की दुहाई देंगे.... अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया से ही दोषियों
को सजा मिल सकती है. प्रतिरोध के स्वर क्या घर से नहीं उठ सकते हैं? सामाजिक बहिष्कार की शुरुआत क्या घर से नहीं हो सकती? मनुष्य से इंसान बनने की शुरुआत घर से ही होती है, तो क्या दंड का प्रावधान घर से शुरू नहीं किया जा सकता? इसलिए बहिष्कार की शुरुआत घर से हो तो ज्यादा असरदार होगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. नहीं तो निश्चित रूप से भीडतंत्र के त्त्थाकथित न्याय की या न पहली घटना है न आखिरी कही जा सकती है, वैसे भी अब तो देश की आने वाली पीढ़ी दंगाइयों के रूप में तब्दील हो भी रही है, तो ऐसे दंगे- फसाद तो होते रहेंगे. न्याय- व्यवस्था भी है, लेकिन वह मूकदर्शक है क्योंकि उसे भी इसका अभ्यास हो चुका है. पुलिस बस वहाँ होने भर को है कुछ रोकने को नहीं. भीड़ ‘रोबो रिपब्लिक’ बन कर न्याय करेगी, क्योंकि उसको न्याय करने का सर्टिफिकेट मिल चुका है. इसलिए न पुलिस, न अदालत न दलील कुछ भी काम न आएगी. संभलने की जरूरत है,  क्योंकि डेमोक्रेसी नहीं अब यहाँ मोबोक्रेसी है लिंचोक्रेसी है. नहीं चेते तो ऐसे ही चलता रहेगा...

स्त्री खिलौना या खिलौना स्त्री




कितना अच्छा हो वो न अपना हक मांगे, न अपनी पहचान बनाने की कोशिश करे, न अपना स्पेस, न अपनी खुशी न अपना जीवन। कोई भी मांग होठों पे न आए। आए तो बस अपने साथी के लिए प्यार और न मिटने वाली कभी मुस्कान। भले ही वह मुस्कान उसकी अपनी खुशी के एवज में न हो। वह अपने साथी के मूड के हिसाब से हँसेगी और रोएगी भी। जीवन के साथ उसकी सांस भी साथी की गुलाम होगी। यहीं नहीं देखने मे गोरी, सुंदर, भरी-पूरी और पूरी तरह से आज्ञाकारी। पितृसत्तात्मक समाज में ऐसी ही औरतें सरहनीय हैं और एडयोंरेबल हैं। पुरुषों की पसंद से ही उनके रूप को सर्टिफिकेट दिया जाता है। इंसान के दायरे में  शायद ही उन्हें लेकर सोचा जाता है उनको। जी हाँ, बात स्त्री की हो रही है। उस स्त्री की जिसके बारे में सिनेमा ने भी चीख- चीख कर कहा है कि 'स्त्री देह की नहीं बल्कि प्रेम, सम्मान और इज्जत की भूखी है'| यहाँ सिर्फ सिनेमा की बात नहीं, स्त्री मन को उभारने की कोशिश है। अब जब समाज स्त्री को एक कमोडिटी के रूप मे देख रहा है तब भला बाज़ार उस सोच को भुनाने में पीछे क्यों रहे? अब तक तो शारीरिक सुख देने वाले खिलौने ही मार्केट मे थे, अब पूरी- की- पूरी औरत ही मार्केट मे तैयार है। कम पैसे वाले सेक्स एजेंट बनी औरतों से हॉट बातें बोल-सुन  कर काम चला रहे हैं या थे भी, उच्च वर्ग साक्षात अपने मनोरंजन को  अपने हाथों मे रखेगा, यानि फूल कमांड
चीनी कंपनी डब्‍ल्यूएमडॉल सेक्स डॉल बनाती है, मार्केट में अपने प्रॉडक्ट को लॉंच किया है।.कंपनी के डायरेक्‍टर दांग्यू यांग ने खुद अपने साक्षात्कार मे स्वीकारा है कि, “ये सेक्‍स डॉल पत्‍नी और गर्लफ्रेंड की जगह ले सकती है। पुरुषवादी सोच वाले तथाकथित मर्द हाड़- मांस की जीती- जागती औरतों से अपने अनुरूप इशारे पर नाचने वाली गुड़िया बनाना चाहते हैं, उनके लिए सामग्री कंपनी ने माल तैयार कर दिया है। बस बैटरी चार्ज करना है और एक बटन पर सब कुछ उनके अनुरूप। सिर्फ और सिर्फ प्यार देने को तत्पर। क्योंकि उसके पास अपनी भावनाएं तो होंगी ही नहीं। वैसे भी स्त्री की भावनाओं का करना भी क्या है? इस चीनी गुड़िया की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार मे 2 लाख रुपये है। इस गुड़िया की खासियत है कि वह न सवाल करेगी और न बराबरी का हक़ मांगेगी। इसके अलावा वह सब करेगी, जो मर्द उसके साथ करना और करवाना चाहेंगे। ये चीनी गुड़िया दिखने में असली औरत जैसी लगती है. उसका चेहरा, बाल, नाखून, हाथ, पैर और चिकनी त्‍वचा है। वो स्त्रीवादी भी नहीं है, न उसके नखरे उठाने हैं, न ही ताने सुनने हैं। इसलिए अब पुरुषवादी सोच वाले समाज को न तो बेकाबू औरतों पर खाप पंचायत बिठाने की जरूरत होगी न फतबा जारी करने की ड्यूटी और न ही बलात्कार तेजाब फेंकने जैसे (कु) कर्म करने पड़ेंगे। अभी कुछ दिन पहले की घटना हरियाणा की है, जिसमें सीबीएसीई टॉपर के साथ गैंगरेप की घटना घटी। कई कारणों के साथ उसका टॉपर होना भी शामिल है। जो उन लड़कों को रास न आया। सोचनीय है, समाज किस ओर जा रहा है। सेक्स का बाज़ार जिसे सिर्फ देह का बाज़ार कहा जाए तो आंकड़े चौकाने वाले हैं।
हैवोकस्कोप रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक देह व्यापार में भारत को भी बड़ा बाजार बताया गया है।. इंडोनेशिया में देह का कारोबार 2.25 अरब डॉलर का है, यूनिसेफ के मुताबिक इंडोनेशिया में देह व्यापार से जुड़ी 30 फीसदी युवतियां नाबालिग हैं। स्विटजरलैंड 3.5 अरब डॉलर का है। तुर्की में देह व्यापार कानूनी होने के बावजूद 4 अरब डॉलर का है। फिलीपींस 6 अरब डॉलर का कारोबार है। थाईलैंड 6.4 अरब डॉलर का कारोबार करता है। यह देश भी सेक्स टूरिज्म के लिए मशहूर है। थाइलैंड में देह व्यापार कानूनी है। यहां खास जगहों पर ही देह व्यापार की अनुमति है। स्थानीय अधिकारी यौनकर्मियों की रक्षा भी करते हैं। कहा जाता है कि वियतनाम युद्ध के बाद से ही थाइलैंड सेक्स टूरिज्म के लिए मशहूर हुआ। भारत में सेक्स कारोबार 8.4 अरब डॉलर का है। दक्षिण कोरिया 12 अरब डॉलर और अमेरिका 14.6 अरब डॉलर का सेक्स कारोबार है। अमेरिका में आमतौर पर देह व्यापार कानूनी है। हालांकि नेवाडा राज्य के कुछ इलाकों में यह गैरकानूनी है। अमेरिका में देह व्यापार के लिए आधिकारिक तौर पर आवेदन किया जा सकता है। जर्मनी 18 अरब डॉलर है। अनुमान के मुताबिक जर्मनी में 40,000 सेक्स वर्कर हैं। यह कानूनी है लेकिन सामाजिक दशा और अधिकारों से जुड़े कई नियम हैं। जापान 24 अरब डॉलर का है। स्पेन 26.5 अरब डॉलर का है। और अंत में  चीन में 73 अरब डॉलर के साथ दुनिया का सबसे बड़ा यौन कारोबार इस देश में होता है। यहां देह व्यापार गैरकानूनी है।
ये आंकड़े तो प्रत्यक्ष रूप से स्त्री को सिर्फ देह के रूप में भोगने और परोक्ष रूप से सेक्स की जरूरतों को बताते हैं, जिसे बाज़ार मुहैया कराता है। मगर उस मानसिकता का क्या जो जीते- जागते इंसान को खिलौना समझता हो और फिर खिलौने को इंसान के रूप मे देखने की कोशिश करे? गंभीर और सोचनीय विषय है। चिंतन की आवश्यकता है!!